विदेशी निवेश के मिले-जुले संकेतों के बीच रुपया स्थिर, बॉन्ड यील्ड में नरमी

नई दिल्ली, 6 अक्टूबर 2025: भारतीय वित्तीय बाजार इस समय विदेशी निवेश के दोहरे रुख का सामना कर रहा है। एक ओर जहां विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (FPIs) भारतीय शेयर बाजार से लगातार अपनी पूंजी निकाल रहे हैं, वहीं दूसरी ओर बॉन्ड बाजार में सकारात्मक रुझानों के चलते सरकारी बॉन्ड यील्ड (प्रतिफल) में नरमी देखने को मिल रही है। इन मिले-जुले संकेतों के बीच भारतीय रुपया काफी हद तक स्थिर बना हुआ है।

शेयर बाजार से विदेशी निवेशकों का मोहभंग

विभिन्न मीडिया रिपोर्टों और बाजार के आंकड़ों के अनुसार, साल 2025 भारतीय इक्विटी बाजार के लिए विदेशी निवेशकों के लिहाज से चुनौतीपूर्ण रहा है। इस साल अब तक, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने भारतीय शेयरों में लगभग 2 लाख करोड़ रुपये की शुद्ध बिकवाली की है। विश्लेषकों का मानना है कि इस भारी निकासी के पीछे मुख्य रूप से दो कारण हैं:

  1. उच्च मूल्यांकन: भारतीय शेयर बाजार का मूल्यांकन अन्य उभरते बाजारों की तुलना में काफी अधिक है, जिसके कारण विदेशी निवेशक मुनाफावसूली कर अपना पैसा स्पेन, दक्षिण कोरिया और अन्य सस्ते बाजारों में लगा रहे हैं।
  2. कमजोर रुपया: डॉलर के मुकाबले रुपये में आई गिरावट ने भी विदेशी निवेशकों के रिटर्न को प्रभावित किया है, जिससे वे भारतीय बाजार से बाहर निकलने पर विचार कर रहे हैं।

बॉन्ड बाजार में राहत के संकेत

इक्विटी बाजार के विपरीत, बॉन्ड बाजार में नरमी के संकेत हैं। भारत के 10-वर्षीय सरकारी बॉन्ड की यील्ड में गिरावट दर्ज की गई है। बॉन्ड यील्ड में गिरावट का मतलब है कि बॉन्ड की कीमतों में वृद्धि हो रही है, जो बाजार में इसकी बढ़ती मांग को दर्शाता है। इस मांग के पीछे भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा उठाए गए कदम और विदेशी निवेशकों की भारतीय ऋण बाजार में संभावित रुचि हो सकती है। बॉन्ड यील्ड में कमी अर्थव्यवस्था के लिए एक सकारात्मक संकेत है क्योंकि इससे सरकार और कंपनियों के लिए उधार लेने की लागत कम हो जाती है।

रुपये पर असर और आगे की राह

शेयर बाजार से बड़े पैमाने पर विदेशी पूंजी की निकासी के बावजूद, भारतीय रुपया उल्लेखनीय रूप से स्थिर बना हुआ है। इसका श्रेय भारत के मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार को दिया जा सकता है, जो किसी भी बड़े झटके को सहने में सक्षम है।

विश्लेषकों का मानना है कि भारतीय बाजार के लिए आगे की दिशा वैश्विक आर्थिक परिदृश्य और अमेरिकी फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीतियों पर निर्भर करेगी। यदि भारतीय शेयरों का मूल्यांकन उचित स्तर पर आता है और कॉर्पोरेट आय में सुधार होता है, तो विदेशी निवेशक फिर से खरीदारी की ओर लौट सकते हैं। तब तक, भारतीय रुपये की स्थिरता और बॉन्ड यील्ड का रुख काफी हद तक RBI की नीतियों और घरेलू आर्थिक प्रदर्शन पर निर्भर करेगा।

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